ये हवा ये रात ये चाँदनी....!

किस्सागोई काफ़ी दिनों के बाद रात में छत पर सोने का मौका मिला। दिल्ली की गर्मी और बिजली की नुका छिपी अक्सर ऐसा मौका देती ही रहती है। लेकिन खुली हवा में सोने से अक्सर बचता ही रहा हूं। कल रात बत्ती फिर से दगा दे गई। कमरा उमस से भर गया। हार कर छत पर छला गया। मां न... [पूरी पोस्ट]
writer Rajiv K Mishra : Roam-antic Realist
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[07 Jul 2009 18:13 PM]

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