एक, मुट्ठी धूप

कवितायन एक, मुट्ठी धूप की तलाश में पूरी जिन्दगी गुजर गई हथेलियाँ नही थाम पायी अपने हिस्से में आई धूप यादों के सिलसिले सी बस बरसती चली गई मुसलसल स्याह नम अंधेरों में घुली हवा बुझा रही थी आग जहाँ भी थी / जितनी भी गुनगुनी धूप, जब सरकी उंगलियों की दरारों से तो द... [पूरी पोस्ट]
writer मुकेश कुमार तिवारी
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[07 Jul 2009 09:24 AM]

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