विलोम
मुट्ठी भर दिन चुटकी भर रातें, गगन सी चिंताएँ, किसको बताएं? जागती सी रातें, दिन हुए उनींदे, समय का विलोम कैसे सुलझाएं? भागती सी सड़कें, खाली नहीं आसमान, दो घड़ी का सन्नाटा , हम कहाँ से पायें?...
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वन्दना अवस्थी दुबे
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[07 Jul 2009 04:02 AM]



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