बजट से यूं बनती है एक छन्दमुक्त कविता

आपका पन्‍ना वे छह छंदमुक्त कविताएं सुना लेने के पश्चात् सातवीं के लिए ‘स्टार्ट’ ले रहे थे। ज्ञान की खूंखार चमक चेहरे पर थी। छह सुना लेने की प्रचंड संतुष्टि से आप्लावित दिखाई दे रहे थे। ‘ये लीजिए जनाब, एक और, शीर्षक है अंतर्देशीय-पत्र..’ अंतर्देशीय, तुम और मैं..।... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल पाण्डेय

बजट व्यंग्य

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[07 Jul 2009 03:07 AM]

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