परदेशी
सावन में इस बार, फिर से झमका पानी, याद आ गई उस, नवयवना की कहानी, पूरे सावन बैठ झूले पर, कजरी गाती रहती , परदेशी पिया की याद में , अक्सर खोयी रहती, इस आशा में शायद, परदेशी लौट आए, फिर से उसका यह सावन हरा भरा हो जाये। - नवनीत नीरव -...
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Navnit Nirav
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[07 Jul 2009 01:25 AM]



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