पहचान

feminist poems इस भीड़ में चेहरे हैं बहुत पर कोई पहचाना चेहरा नहीं मिलता. चेहरों के पीछे चेहरें हैं और उसके भी पीछे चेहरे अपनों के बीच भी कोई अपना नहीं मिलता. क्यूँ अपनी पहचान को छिपाते हैं यहाँ लोग जो जहाँ जैसा है क्यूँ वैसा नहीं मिलता.... [पूरी पोस्ट]
writer mukti
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[06 Jul 2009 15:06 PM]

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