डबरे पर सूरज का बिम्ब
जब उससे मैं सड़क पर मिला, मुझे लगा कि वह ठीक बात करने के मूड में नहीं है। राह में मुझे देखकर वह खुश नहीं हुआ था। उसकी शर्ट की पीठ पसीने से तर-बतर थी, बाल अस्त-व्यस्त थे। और चेहरा ऐसा मलिन और क्लान्त था मानो सौ जूते खाकर सवारी आ रही हो। तत्काल निर्णय ल...
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रंगनाथ सिंह
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[05 Jul 2009 11:16 AM]



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