शब्-ए-खामोश
बादलों के आगोश में गुम आज चांदनी धुंधली सी है सबा के आँचल में जब्ज आज थोड़ी नमी सी है कुमुदनी के रुखसारों पे इक बूँद शबनमी सी है शब् - ए - तनहा महफ़िल में छाई जैसे कोई ग़मी सी है रुत की खामोशियों में इक ग़ज़ल की कमी सी है ( चित्र गूगल सर्च से साभार)...
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अर्चना तिवारी
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[05 Jul 2009 07:03 AM]



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