वो दिन गए जब रखते थे आंखों में हया लोग

कुछ शब्द वैसे तो मैं कोई ढंग का शायर नहीं हूं , वो तो हृदय की संवेदना है जो शब्दों में उतर आती है और फ़िर गुरूजन उसे कहने लायक बना देते हैं। पढ़िये एक गज़ल जो आज ही मुकम्मल हुई है गुरूदेव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से। रफ़्तार के इस दौर में भूले हैं वफ़ा लोग सोचो ज... [पूरी पोस्ट]
writer रविकांत पाण्डेय
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[04 Jul 2009 05:29 AM]

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