जब आंखो में नमी आती है...

अर्ज़ है... जैसे सावन की घटा ज़रा सा बरसे और फिर धूप निकल आये। -जैसे कोई मेहमान चंद रोज़ घर में क़हकहे बिखेर कर वापस चला जाए। -जैसे छुट्टी का दिन आकर गुज़र जाए। -जैसे त्योहार के रोज़ की शाम। -जैसे दुल्हन की रुख़सती के बाद घर। -जैसे किसी परदेसी की अलविदाई मुस्कुर... [पूरी पोस्ट]
writer अबयज़ ख़ान
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[04 Jul 2009 02:48 AM]

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