जेठ बुलाए

रजनीगन्धा उड़ती फ़ूस कटी-कटी धूप गुड़-गुड़ करती बाबा के हुक्के की मूँज जेठ दुपहरी छाँव तले गिलहरी किट-किट करती अम्मा की सुपारी दिन सून लम्बे दिन लम्बी तारीखें औंधे मुँह ऊँघती जीजी की किताबें, परचून गुम हवा झुलसी धरा मेढ़ पर सोचती उसकी आँखें लगी, सब सून ____________... [पूरी पोस्ट]
writer रजनी भार्गव
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[03 Jul 2009 22:25 PM]

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