डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद.
ग़ज़ल मेरी जानेमन, मेरी जानेजां, मेरी चश्मेनम, मेरी दिलरुबा. तेरे इश्क में, तेरी चाह में, दिल हो गया, मेरा बावरा. मेरे पात सारे हैं झर गये, मैं तो ठूंठ में हूँ बदल गया, तू समन्दरों पे बरस गयी, तेरी राह मैं रहा ताकता. मेरी आँख ये है भर आयी क्यों, मेरे...
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डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[03 Jul 2009 03:22 AM]



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