आख़िर क्यों ?
आख़िर क्यों क्यों क्यों ? ये 'क्यों' है... एक प्रवृत्ति के लिए। प्रवृत्ति दूसरों की ज़िंदगी में ताक-झांक करने की। कई बार हैरानी होती है कि क्यों हमारी दिलचस्पी अपने नंगे सचों को देखने के बजाए दूसरों की ज़िंदगी को नंगा करने में होती है? जहां चार लोगों...
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राकेश त्रिपाठी
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[02 Jul 2009 13:08 PM]



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