एक ग़ज़ल : ज़माने की अगर हम....
ज़माने की अगर हम बेरुखी से डर गए होते वह दिल की आग थी वरना कभी के मर गए हो्ते अगर हम ज़ब्त ना करते सदा-ए-दिल गमे-उल्फ़त जो टकराते पहाड़ों से पिघल पत्थर गए होते हमारा ज़िक्र भूले से कोई जो कर गया होता यकीनन उनकी आँखों में आँसू भर गए होते अगर बुतख़ाने से पहल...
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आनन्द पाठक
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[02 Jul 2009 10:49 AM]



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