मिलन
मेरे ज़ेहन में उठनेवाले सारे सवालों में मिलना । रात- दिन तुम मुझको मेरे ख़यालों में मिलना ॥ मैं हवा हूँ, कर न पाऊँ 'ग़र मुलाक़ात हर रोज़ पलकों के अँधेरे में मिलना, धड़कन के उजालों में मिलना । हर पल पसंद है तेरा रुप- श्रृंगार मुझको बंद ज़ुल्फ़ों में मिलो...
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Anurag Srivastava
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[02 Jul 2009 01:37 AM]



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