शोला हो चुकी निगाहों के जरिए
शोला हो चुकी निगाहों के जरिए
(a poem by ravi kumar, rawatbhata) मैं नींद खोजता रहा
नींद एक ख़्वाब
बिल आखिर कंटीली झाड़ियों के इक सहरा में
मुझे नींद मिली
और वस्ल के ख़ामोश समन्दर की गहराई में
नींद को ख़्वाब
पर कंटीली झाड़ियों की नींद में
वस्ल का ख़्वाब
रेत...
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रवि कुमार, रावतभाटा
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[01 Jul 2009 08:31 AM]



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