ग़ज़ल
कांटे चुनता रहता हूं. रिश्ते बुनता रहता हूं. मेरी कौन सुनेगा अब, मैं ही सुनता रहता हूं. इस आती पीढी को देख, सर को धुनता रहता हूं. जाने किन उम्मीदों में, सपने बुनता रहता हूं. ये दिन भी कट जायेंगे, सबसे सुनता रहता हूं....
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संजीव गौतम
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[01 Jul 2009 07:00 AM]



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