काल-कलौटी..
निखिल भैआ, आ गये अचपन जी ? " कुछ सुनी-सुनी सी आवाज है, मैं सतर्क होता हूँ । दुबारा से " निखिल भैआ, आ गये अचपन जी ? " एक बार फिर दोहराया गया । अरे, ये तो अपना वैभव है, बहुत दिन बाद इनकी आवाज़ सुन रहा हूं । " नहीं बेटा, देखो शायद आज...
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डा. अमर कुमार
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[01 Jul 2009 01:57 AM]



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