नोट सौ सौ के टूट जाते हैं
ज़िन्दगी इस कदर उदास हुयी अब वो नाराज़ तक नहीं होती नोट सौ सौ के टूट जाते हैं और आवाज़ तक नहीं होती...
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वीरेन्द्र जैन
व्यंग्य कविता
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[01 Jul 2009 01:02 AM]



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