ईर्ष्या ! तू न गयी मेरे मन से !
डा.राम कुमार वर्मा के एक निबंध से प्रेरित; स्थायी पंक्ति उसी निबंध का शीर्षक है ) ईर्ष्या ! तू न गयी मेरे मन से ! भाँति भाँति के दरवाजों से, मन में तू पग धरती है तरह तरह के रूप बदलकर, अंतह में तू जलती है बढ़ जाती जब तेरी ज्वाला, दग्ध हृदय का आँगन होता...
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प्रताप नारायण सिंह
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[30 Jun 2009 07:40 AM]



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