सुबह का इंतजार

कवितायन रात, के बाद सुबह आती है यह मेरा भी विश्वास था अपने हिस्से की रात को किसी भी तरह मैं बदल देना चाहता था सुबह में सूरज, को अपने आँगन में उगाने के लिये नींद के चाक पर मैंने गढे सपनें सुबह के अंधेरे को सारी रात जगाया सूरज जैसे निकलना ही नही चाहता हो अपनी... [पूरी पोस्ट]
writer मुकेश कुमार तिवारी
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[30 Jun 2009 06:57 AM]

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