तू आज भी दगा दे गई...!

किस्सागोई आज भी तेरा इंतज़ार करता रहा। दिन भर आसमान में बादलो की लूका-छिपी देखी। दिन के तीन बजे ठंडी हवा के हल्के झोकों ने इशारा किया....तुम कहीं आसपास ही हो। ख़ुश इतना हुआ कि चलती गाड़ी से उतर कर तुम्हारी आहट की तश्वीर उतारी। तुम गरजी भी, लेकिन बरसी नहीं........ [पूरी पोस्ट]
writer Rajiv K Mishra : Roam-antic Realist
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[29 Jun 2009 15:43 PM]

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