यादों में बसे लोग- 5
यथार्थ तो परछाई की तरह है... कवि ‘अव्यावहारिक’ जीव होता है... व्यथित जी जब कभी पटना आते और हमलोग मिल बैठते तो आलोक धन्वा की चर्चा अवश्य होती। आलोक जी की कविताओं से वे बेहद प्रभावित थे। वे जब बात करने लगते तो निर्दोष बच्चों-सी ललक दिख पड़ती उनमें। मैं...
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राजू रंजन
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[29 Jun 2009 10:45 AM]



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