तुम्हारी उर्मिला
तप रही है ये जमीन इस बार मानसून नहीं आया अब तक फट रहा है धरा का कलेजा बारिश की चाह में हाहाकार मच रहा है, चहुं ओर बहुत दिन हो गए भीगे हुए मुझे भी तो, तुम्हारे स्नेह में उर्मी, उर्मी सुन रही हो तुम सुन रही हूं, तुम्हारी पुकार को आज बस तुम्हे ही सु...
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Sonalika
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[29 Jun 2009 02:14 AM]



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