लोकतंत्र की दुहाई के बहाने
सीधी-सी बात है। दुहाई देने में न पैसे खर्च होते हैं न दिमाग। आप अपनी सुविधानुसार कहीं भी, किसी भी बात या संदर्भ में कुछ भी दुहाई दे सकते हैं। दुहाई सबके लिए मुफीद है। दुहाई देने से बात का वजन बढ़ता है। बुद्धिजीवियों के बीच आपकी अलग-सी छवि बनती है। वि...
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अंशुमाली रस्तोगी
विमर्श
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[29 Jun 2009 01:11 AM]



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