हक़ की लडाई

सागरिका शक्ति बिन शिव अधूरा राधा बिन श्याम नारी बिन नर अधूरा सीता बिन राम । फिर भी ये औरत सोच ! सोच उन सुविधाओं के बारे में जो प्रकृति ने तुझे दी औ' समाज ने खसोट लीं... पैदा तो हुई तू पुरुष के साथिन के रूप में दैया रे दैया ! आज तो उसीकी गुलाम बन गई ! कभी किस... [पूरी पोस्ट]
writer गुर्रमकोंडा नीरजा
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[28 Jun 2009 09:26 AM]

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