पगली कूक-कूक चिल्लाये
भारत में जहाँ मानसून के लिये तरसा जा रहा है, बरसात कभी भी आ सकती है, वहीं यहाँ अभी-अभी गर्मी शुरु हुई है। ऐसे में भी, मगर कविता लिखते समय भारत की गर्मी की ही छवि सामने होती है। गर्मी के दिन फिर से आये सुबह सलोनी, दिन चढ़ते ही बन चंडी आंखें दिखलाती पीप...
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मानसी
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[28 Jun 2009 01:50 AM]



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