परिभाषाओं की बही -----
कुछ भी करिए सब सही है देखते नहीं मेरे हाथ में परिभाषाओं की बही है! मेरे अपने जब करते हैं तो बलात्कार को भी मैं ' स्वीकार' लिखता हूँ किसी और के लिए तो गुफ्तगू को भी मैं 'अनाचार' लिखता हूँ सच के खिलाफ पल में झूठ की गवाही दिला देता हूँ जानता हूँ इस तथ्य...
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M VERMA
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[27 Jun 2009 20:40 PM]



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