कभी आ कर तो देखो
रस्में पुरानी ही सही, पांव की बेड़ियां ही सही हो कर दूसरों के, रस्में निभाकर तो देखो तुम्हारी थी दुनियाँ तुम्हारी ही है दुनियाँ हमें भी कभी दुनियाँदारी सिखा कर तो देखो खुली हवा में सांस ले ली, मेड़ों मे अठखेलियां कर ली अब बंद है आशियाना, इसमें समा कर...
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मथुरा कलौनी
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[26 Jun 2009 12:46 PM]



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