"मन की गिरह"

एक नीड़ ख्वाबों, ख्यालों और ख्वाहिशों का जी चाहता है मन की गिरह खोल दें , जो कुछ अंदर छुपा हैं सब बोल दें , ज़माने के फेर में हम पड़ गए थे , उलझी से दुनिया में उलझ से गए थे। कोशिश की हवा के साथ बहने की , झूठी , मक्कार , बेईमान बनने की , इस दिशा में सारी जुगत लगाई , जो नहीं सीखी थी वो भी तरती... [पूरी पोस्ट]
writer Priya
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[26 Jun 2009 05:08 AM]

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