"मन की गिरह"
जी चाहता है मन की गिरह खोल दें , जो कुछ अंदर छुपा हैं सब बोल दें , ज़माने के फेर में हम पड़ गए थे , उलझी से दुनिया में उलझ से गए थे। कोशिश की हवा के साथ बहने की , झूठी , मक्कार , बेईमान बनने की , इस दिशा में सारी जुगत लगाई , जो नहीं सीखी थी वो भी तरती...
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Priya
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[26 Jun 2009 05:08 AM]



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