अब बरस भी जाओ बादल ....

मन वृन्दावन सरस घनश्याम आ जाओ तरणी के ताप से व्याकुल दिशाएं तप रहीं लू से हवाएं गर्म चलती हैं निराश्रित वृद्ध सी दोपहर कुँवारी साध सी ढलती बढ़ी आती है गर्मी अब सरासर सीढियां चढ़तीं ये कैसी उठ रही लपटें असहनीय दर्द सी चुभती उधर अम्बर सुलगता है धरा पर आंधियाँ चलतीं... [पूरी पोस्ट]
writer Deepa Pant
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[25 Jun 2009 15:33 PM]

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