तुम सदा ही गीत बनकर
तुम सदा ही गीत बनकर शब्द में ढलती रहो तुम सदा ही प्रीत बनकर हृदय में पलती रहो हर मरुस्थल राह का बहु पुष्प से भर जाएगा संग मेरे, तुम सदा यदि बाँह धर चलती रहो मैं अकेला ही सफर में आज तक चलता रहा शाप कोई, प्राण में, बड़वाग्नि सा जलता रहा हर तपन, हर पीर,...
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प्रताप नारायण सिंह
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[25 Jun 2009 08:36 AM]



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