भुगती हुई अंतर्कथा ----
नज़्म सी नाज़ुक एहसास की टहनी झुकी विश्वास न जाने क्यूँ देहरी तक आकर रुकी भीड़ में ठिठकी हुई नीड़ की व्यथा मानवीय संत्रास की भुगती हुई अंतर्कथा ---- . अश्क का कुहराम नयन में आठो पहर जीजिविषा - संग्राम शयन में आठो पहर पहचान सर उठाते नहीं सागर सा मथा मानव...
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M VERMA
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[25 Jun 2009 08:18 AM]



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