नाम तुम्हारा आ जाता है
क्या बतलाऊँ कितना रोका है मैने अपना पागल मन लेकिन होठों पर रह रह कर नाम तुम्हारा आ जाता है उड़ती हुई कल्पनाओं ने देखा नहीं क्षितिज पर कोई चित्र, स्वप्न बन कर वह लेकिन आंखों में आ छा जाता है देहरी पर आकर रुक जाती है जब गोधूली की बेला तब सहसा ही हो जाता...
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राकेश खंडेलवाल
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[25 Jun 2009 07:52 AM]



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