इतनी बहस बुर्क़े पर
मैं फिर अपना शेर दोहराता हूँ - न जाने कुफ्र-ओ-ईमां की कहाँ जाकर हदें छूटें, चलो ढूँढें नया कोई अमीर-ए-कारवाँ अपना। ( कुफ्र-ओ-इमाँ - आस्तिकता और नास्तिकता , हदें छूटें - सीमाओं से बाहर आयें, अमीर-ए-कारवाँ - नेतृत्व करने वाला, कारवाँ की अगुवाई करने वाल...
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हर्ष प्रसाद
आज़ादी
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[24 Jun 2009 14:27 PM]



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