कब आओगे मेघ और फिर कब बरसोगे
राह तकत नयना थके, सतत जोहते बाट |माह अषाढ़ भी जा रहा , नहीं आई बरसात ||तपन नहीं अब सहन है , अब आये मानसून | छींटे भी दुर्लभ हुए, बीत चला है जून || चार माह से कृपा बहुत , हे रवि तुमरा तेज़ | रात हुए भी चुभत है , गरम गरम यह सेज || नहीं चैन दीखत कहीं ,...
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प्रदीप मानोरिया
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[24 Jun 2009 00:32 AM]



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