लौट नहीं सकती मैं
पहाड़ों, झरनों और नदियों पर रेगिस्तानों, मैदानों में गलियों, सड़कों में बर्फ में, पानी में कहीं नहीं हैं ये सब पार कर आई यहां सब कहीं ढूंढ़ आई तकियों के गिलाफों में चादर की सिलवटों में कपों के हेंडलों पर इस कमरें की दीवार पर पर भी मिट गए हैं। उंगली क...
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Sonalika
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[23 Jun 2009 11:17 AM]



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