तुम पुनर्नवा हो क्या -----?
तुम आसपास कहीं नहीं पर तुम्हारे ख़याल की आहट से सरगोशियां होती हैं शाख-ए-वज़ूद को मेरे तुम हिला देती हो कुछ अधमरे एहसासों को तुम जिला देती हो तुम हवा हो क्या-----? तुम ज़ुबान से दिलासा नहीं देती नज़र की छुवन से ही सकूं दे जाती हो और मैं सो जाता हूं सपन...
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M VERMA
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[23 Jun 2009 10:37 AM]



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