फरिद के श्लोक - ३७
ढूढेदीऐ सुहाग कू,तउ तनि काई कोर॥जिना नाउ सुहागणी, तिना झात न होर॥११४॥सबर मंझ कमाण, ऐ सबरु,का नीहणो॥सबर संदा बाणु, खालकु खता न करी॥११५॥सबर अंदरि साबरी,तनु ऐवै जालेनि॥होनि नजीकि खुदाऐ दै,भेतु न किसै देनि॥११६॥सबरु ऐहु सुआउ,जे तूं बंदा दिड़ु करहि॥वधि थीवह...
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परमजीत बाली
परमजीत बाली
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[23 Jun 2009 02:57 AM]



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