समझने योग्य
मुझे तुम्हारे कंक्रीट के जंगल से कोई शिकायत नहीं और ना ही नफ़रत है तुम्हारे लगाव से. और ना ही गुस्सा हूँ तुम पर, तुम्हारे चुनाव से. लेकिन मैं ये पेड़-पौधे, ये दूब, ये कांटे नहीं छोड़ पाऊँगा जो कुछ जन्म से मेरा है, प्राकृतिक है वो जमीनी बंधन ’मैं’ नही...
[पूरी पोस्ट]
विकास कुमार
मेरी कविताएँ
25
2
0
2
3
[23 Jun 2009 02:11 AM]



Shuffle








