* स्वर्ण मुद्रिका लाख * (जयंत)
मन जिसका जैसा रहे , वैसे देखे आँख , कूड़े सी ताते दिखे , स्वर्ण मुद्रिका लाख ॥ - मन के भावों ने अनुसार , द्रष्टिकोण भी बदल जाता है ॥ संसार में प्राणी को वोही दिखाई देता है जो वो देखना चाहता है ॥ जिसके मन में गन्दगी है , वो स्वर्ण के ढेर ( याने गुणों क...
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Jayant Chaudhary
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[23 Jun 2009 01:55 AM]



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