क्षितिज

क्षितिज ग्यारह सितंबर के बाद प्रकृति ने विनाश किया था तब तुम भी रोये थे। बिजली चमक कर गिर कर पेड़ ही नहीं हमारे आशियाने को भी जला गई थी। सैलाब ने पेड़ पौधे जानवर ही नहीं आदमी को भी बहा दिया था तब हम साथ-साथ रोये थे हमने एक दूसरे को पुकारा था सहारा दिया था जो... [पूरी पोस्ट]
writer उषा वर्मा
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[22 Jun 2009 17:10 PM]

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