जगमग दीपों के उत्सव-सा उस दिन से है जीवन सारा
कंटक-पथ से मुझे उठाकर तुमने गले लगाया जब से चंदन की भीनी खुश्बू से भींग गया है तन-मन सारा याद-सरस्वती का आना तो उर में अपने-आप हुआ था नयनों में थीं गंगा, यमुना मिलन-मंत्र का जाप हुआ था मन प्रयाग बन बैठा पावन संधि-काल की उस बेला में लगा डूबकी संगम में...
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रविकांत पाण्डेय
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[22 Jun 2009 12:38 PM]



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