अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको
अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको मैं हूँ तेरा तू नसीब अपना बना ले मुझको - क़तील यूँ तो मैं एक लंबे अरसे से तुम्हें कुछ लिखना चाहता था। मगर सब कुछ ऐसा होता रहा और मैं लिखने का वक्त ही नहीं निकल पाया। आज ख़त की शक्ल में पहला पन्ना सौंप रहा हूँ......
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नई कलम - उभरते हस्ताक्षर
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[22 Jun 2009 08:23 AM]



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