जो छूट गये अब हाथ से मेरे
कुछ दिनों से सोच रहा था
क्या क्या नहीं किया
कितने सालों से.
कि हल्के से यह दिल भींचा
आंख मली कि समझ ना ले कोई
कि वह कचरा नहीं था,
दो बूँदें थीं.
अब यह बूँदें यूँ ही आती हैं.
वैसे नही, जैसे आते थे
गिरने पर आंखों में सरसों के कीड़े.
अब नही दिखते
वो गन्न...
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कौतुक [Kaotuka]
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[22 Jun 2009 05:01 AM]



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