खदबदाहट के बीच जैसे पकना
भीतर की खदबदाहट जैसे उकसाती है………वही खदबदाहट जो चूल्हे पर चढ़े भात के बर्तन में होती है………………पर जब इसमें उफान आता है तो फिर क्या होता है………कारण मालूम नहीं इस खदबदाहट का……लेकिन इक बेचैनी सी तारी रहती है……… हावी नहीं होता खुमार किसी चीज का……………लेकिन भरी...
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Sanjeet Tripathi
कुछ अपनी
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[21 Jun 2009 03:26 AM]



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