लालगढ़ में लालसलाम

कतरनें धूमिल की एक कविता अक्सर मेरे जेहन में उतर आती है ,जो कुछ इस तरह है - वो धड से सर ऐसे अलग करता है जैसे मिस्त्री बोल्टू से नट अलग करता है तुम कहते हो हत्याएं बढ़ रही हैं मैं कहता हूँ कि मेकनिस्म टूट रहा है लालगढ़ में सचमुच मेकेनिस्म टूट रहा है ,ये मेकेन... [पूरी पोस्ट]
writer awesh
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[21 Jun 2009 00:28 AM]

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