क्या-क्या ना बंटा यहाँ .....................
साथियों 30 जनवरी 2007 को एक कविता लिखी थी , आज दराज साफ करते समय डायरी में मिली। आप तक पहुचा रहा हूं। आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है। क्या ना बंटा यहाँ। क्या क्या ना लुटा यहाँ॥ सब कुछ तो बंटा यहाँ। सब कुछ तो लुटा यहाँ॥ अबके दीवार पर धूप भी बैठकर चली...
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प्रशांत दुबे
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[20 Jun 2009 06:21 AM]



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