बेंगलोर में ख़राशें का सफल मंचन

कच्‍चा चिट्ठा हमारा पिछला नाटक कब तक रहें कुँवारे हँसी ठहाकों से भरपूर था। अगले मंचन के लिये एक कॉमेडी की तलाश थी। हाथ लग गया गुलज़ार का लिखा नाटक ख़राशें। मैं साधारणतया उतना भावुक व्यक्ति नहीं हूँ। पर नाटक पढ़ा तो मैं तो हिल गया। सोद्देश्य मंचनीय नाटक कम ही मिलते... [पूरी पोस्ट]
writer मथुरा कलौनी
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[20 Jun 2009 04:35 AM]

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