मेरा पूर्ण तुम हो
मेरे मस्तक पर उभरता मान हो तुम! मेरे प्राणों का सतत उत्थान हो तुम ! मेरे होने का निरंतर भान देता, चेतना में वास करता गर्व तुम हो ! प्रिये! मेरा दर्प तुम हो ! मेरे अंतह की सकल तुम कामना हो! मेरे जीवन की अखंडित साधना हो! ज्वार सी उठती हृदय के सिन्धु मे...
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प्रताप नारायण सिंह
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[20 Jun 2009 01:32 AM]



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